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Monday, 11 March 2019

समत्व योग का व्यवहार




समत्व योग का व्यवहार
          संसार के व्यवहार करने में जिस समय कोई ऐसी जटिल समस्या सामने उपस्थित हो जाती है कि क्या करना उचित होगा ? उस समय दो या उससे अधिक विरोधी धर्मों के संघर्ष का अवसर आ जाता है | जैसा कि अर्जुन के सम्मुख आया था - एक तरफ तो स्वजन बंधुओं से युद्ध करना और दूसरी ओर युद्ध न करने से क्षत्रिय धर्म का नाश यानि अपने कर्तव्य कर्म  से विचलित होनाऐसी परिस्थिति में मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ होकर मोह के दलदल में फँस  जाता है | वह उससे बचने के लिए याने यह तय करने के लिए की सही एवं सत्य क्या है जो कि मुझे करना चाहिए इसके लिए वह नीति और धर्म शास्त्रों द्वारा यह जानना चाहता है अर्थात रास्ता ढूंढने का प्रयत्न करता है लेकिन अपने इस प्रयत्न में शास्त्रों के भेदवाद  के अनेक स्थानों पर परस्पर विरोधी कथनों से उसकी उलझन है सुलझने के बजाय और भी बढ़ जाती है कारण कि उनमें कहीं पर किसी धर्म की विशेषता का कथन मिलता है तो कहीं पर  विरुद्ध धर्म की विशेषता का परस्पर विरोधी ज्ञान मिलता है कहीं दया और अहिंसा की महिमा गाई गई है तो कहीं दुष्टों को दंड देना युद्ध में शत्रुओं को मारना और यज्ञ में पशुओं का वध करना परम धर्म माना गया है कहीं सत्य के बराबर दूसरा कोई धर्म ही नहीं माना है तो दूसरे स्थल पर छलियों  और दुराचारियों  के साथ छल करना न्याय संगत माना है कहीं दान का बड़ा महत्व गाया गया है तो कहीं दान देने से दुर्गति बताई गई है कहीं प्राणी मात्र के साथ मैत्री भाव रखने को कहा गया है तो कहीं पर शठ  और दुर्जनों  के साथ उनके सामान ही शठता आदि का बर्ताव करने की व्यवस्था दी गई है कहीं पर आबाल  ब्रह्मचर्य का अखंड व्रत पालन करने की बहुत बड़ाई की गई है तो कहीं पर संतान पैदा ना करने वालों के लिए नर्क में पड़ना  अनिवार्य बताया गया है कहीं पर माता पिता की भक्ति गाई गई है तो कहीं पर उनके प्रतिकूल आचरण करने वालों की बड़ी प्रशंसा की गई है किसी जगह पर भ्रातृस्नेह  को बहुत सराहा है तो किसी जगह पर विद्रोहियों का बड़ा आदर किया गया है  इस प्रकार से अनंत  प्रकार के भ्रम उत्पन्न करने वाले परस्पर विरोधी वाक्य भेदवाद  के शास्त्रों में पाए जाते हैं और ज्यों-ज्यों  अधिक छानबीन की जाती है त्यों-त्यों  उलझन बढ़ती जाती हैं जिससे साधारण मनुष्य तो ठीक  परंतु अच्छे ज्ञानियों की भी बुद्धि अत्यंत विक्षिप्त हो जाती है और एक निश्चय पर पहुंचना असंभव हो जाता है | 
           इस महान उलझन से पार होकर एक निश्चय पर पहुंचने का एकमात्र उपाय "बुद्धि को सबकी  एकता के साम्य  भाव में स्थित करना है" अर्थात सदा यही विचार करते रहना है कि एक ही आत्मा सब चराचर भूत प्राणियों में समान भाव से व्यापक है उससे अलग या फिर कुछ नहीं है जो छोटे से छोटे जंतु में हैं वहीं बड़ी से बड़ी जगह में है जो एक चरण में है वही ब्रम्हांड में है जो मुझ में है वही दूसरों में हैं इस तरह अभ्यास करते करते बुद्धि जब सर्व भूतों में सामने भाव में जुड़कर निश्चल हो जाती है तब वह भेदभाव की उलझन वाले शास्त्रों  के वाक्यों से विचलित नहीं होती क्योंकि उसकी बुद्धि समस्त ज्ञान में स्थित होकर एक ही आत्मा को सभी चर अचर में व्याप्त देखने के दृढ़ निश्चय पर स्थिर हो जाती है तब उन शास्त्रों में वर्णित तथ्यों का निर्देशों  का उस पर कोई प्रभाव नहीं रहता एवं तब सभी समस्या हल हो कर उस आत्म ज्ञानी पुरुष के लिए सभी व्यवहार सर्व भूतों में साम्य  भाव से होने लग जाते हैं जिन से किसी प्रकार का कोई क्लेश, शोक मोह  एवं बंधन नहीं होता किंतु सदा सर्वदा वह उस सत्य आनंद सच्चिदानंद में ही लीन होकर उस परम सत्य एवं आनंद के धाम को प्राप्त होता है एवं उसके सारे कार्य सभी की भलाई के हेतु स्वयं के स्वार्थ रहित निस्वार्थ भाव से ईश्वर तुल्य होते हैं समत्व योग का व्यवहार करने का इतना महत्व हैं |