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Thursday, 28 February 2019

पक्षपातपूर्ण मनोभाव


 पक्षपातपूर्ण  मनोभाव 


       प्राचीनकाल से मनुष्य समुदाय में विवादों के तीन कारण रहें हैं - भूमि, धन और स्त्री | भारत के विभिन्न ग्रंथों में ऐसे कई प्रसंग हैं जिनमे ये तीन कारण निहित रहें हैं | इसके सबसे बड़े उदाहरण दो महत्वपूर्ण ग्रन्थ महाभारत और रामायण हैं | महाभारत का युद्ध भूमि या राज्य को लेकर हुआ था, हालाँकि उसमे स्त्री का विषय भी निहित था, परन्तु मुख्य विषय भूमि ही था | रामायण के युद्ध प्रसंग में मुख्य विषय स्त्री रहा | सामान्य दृष्टी से देखने पर यह लड़ाई भूमि, धन और स्त्री पर स्वामित्व की लड़ाई प्रतीत होती है | यह प्रत्यक्ष और भौतिक जगत का स्वरुप है | परन्तु इसके अगोचर स्वरुप को अंतर्मन से  देखने पर  पाएंगे कि मन का  द्वैधी भाव यानि पक्षपातपूर्ण विचार ऐसे कारणों को उत्पन्न करता है  | मन की अपेक्षाओं और बाहरी कारणों को लेकर जब पक्षपात मन में उत्पन्न होता है तब उद्देश्य को धर्म या अधर्म से, विहित रीति से या निषिद्ध रीति से किसी भी तरह से प्राप्त हो, उस तरीके का सहारा लिया जाता है | द्वैधी भाव का मतलब यह है कि विभक्त रूप में देखने की दृष्टी , जैसे यह मेरा है यह मेरा नहीं है | जो मेरा नहीं है उसके प्रति अधर्म और निषिद्ध रीति के प्रयोग करने का भाव होता है | विहित रीति और धर्म  पालन करने वाला सुरक्षित रह जाता है |  निषिद्ध रीति और अधर्म का सहारा लेनेवाला नष्ट हो जाता है
         इसलिए संत महात्माओं की शिक्षा यह है की मनुष्यमात्र को यह शिक्षा लेनी चाहिए की वह अपने घरों  में,मुहल्लों में, गावों  में,प्रांतों में, सम्प्रदायों में द्वैधी भाव अर्थात ये अपने है ये पराये है ऐसा भाव न रखे द्वैधी भाव रखने से आपस में प्रेम, स्नेह नहीं होता वरन कलह होती है

Wednesday, 27 February 2019

निर्बाध और शांत जीवन

            
निर्बाध और शांत जीवन

       साथियों आज हम निर्बाध और शांत जीवन के निर्माण की बात करेंगे |  पहला सूत्र यह है कि क्या हमने अपने शरीर के आयामों को या स्तरों को समझ लिया है यदि नहीं तो आज सबसे पहले हमको अपने शरीर के विभिन्न स्तरों को समझ लेना होगा तभी हमारी प्रगति की आधारशिला को हम जान सकेंगे | 
      यही नहीं जीवन में प्रगति के कोई भी सोपान हो कोई भी लक्ष्य हो कोई भी उद्देश्य हो उसको पाने के लिए हमारी सफलता इस आधारशिला को जानने में समझने में निहित है कि हम अपने शरीर के विभिन्न स्तरों को जानलें | इसके लिए कुछ अभ्यास की आवश्यकता होगी, थोड़ा धीरज रखना होगा और हमारे मन की कुछ धारणाओं में परिवर्तन करना होगा |  सबसे पहला अभ्यास यह है कि हम अंतर्मुखी को कर अपने शरीर के तीन आयामों को देखें पहला आयाम है स्थूल शरीर दूसरा आयाम सूक्ष्म शरीर है तीसरा आयाम कारण शरीर है हम इन तीनों शरीरों के कार्यों दायित्व और परिणामों पर सूक्ष्म रूप से विचार करेंगे और अभ्यास के माध्यम से अपनी धारणा को मजबूत करेंगे दृढ़ से करेंगे यह अभ्यास बहुत लंबे समय तक निरंतर उसके अंगों और उपांग सहित अभ्यास करना होगा | इस अभ्यास के पहले हम शरीर के तीनों आयामों को विस्तृत रूप से समझेंगे और उसके बाद नई धारणा स्थापित करेंगे जो वास्तविक धारणा होगी और हमारी प्रगति के लिए ऐसे मजबूत ढांचे के रूप में कार्य करेगी जिससे हमको किसी भी लक्ष्य में और किसी भी दिशा में सफलता देगी | 
      साथियों एक उदहारण के माध्यम से इस अभ्यास की तुलना करते है, जैसे कार स्टार्ट करने के लिए दो तरीके होते हैं पहला चाबी लगाकर कार स्टार्ट करना और दूसरा कार को धक्का देकर स्टार्ट करना | इन दोनों में क्या फर्क है इस फर्क को हम स्वयं के ऊपर देखेंगे | वर्तमान समय में मोटिवेशन कोर्स के रूप में लोगों को टिप्स दी जाती है की ऐसा करिए वैसा करिए और इसका अभ्यास निरंतर करिए तो आप इसके आदी हो जाएंगे और कठिनाइयों पर सफलता प्राप्त कर सकेंगे यह तरीका कार को धक्का देकर स्टार्ट करने की तरह है दूसरा तरीका जब व्यक्ति खुद का आकलन करता है खुद की आदतो और कमियों का परीक्षण करके उनको दूर करने की विधि सम्मत प्रक्रियाओं से अभ्यास करता है |  इसके साथ ही वह अपने अंदर के गुण और विशेषताओं को परिमार्जित करता है तब ऐसे आंतरिक अभ्यास से व्यक्तित्व का विकास गतिमान होता है यह कार को चाबी लगाकर स्टार्ट करने की तरह है |  
        प्रगति के लिए उन्नति के लिए जो साधन सुविधाएं उपलब्ध हैं उनका बेहतर तरीके से उपयोग करें और उनका दोहन करके अपनी योग्यता को बढ़ाएं या उन सुविधाओं का दुरुपयोग करके उपेक्षा करके और उन को नष्ट कर दें यह हमारी सोच पर निर्भर है |  हम भौतिक शरीर में दिखाई देने वाली शक्तियों आकलन करते हैं, जबकि ईश्वर ने हमको शरीर के अंदर भी अद्भुत शक्तियां दी है, अद्भुत ज्ञान दिया है किंतु हम अज्ञानतावश इन शक्तियों को विभिन्न दोषों से ढक देते हैं और यह सोचते हैं कि हमको ऐसी शक्ति अर्जित करना है वैसे योग्यता अर्जित करना है, जबकि दुनिया की हर शक्ति, काबिलियत और योग्यता हमारे अंदर ही मौजूद है | इस प्रकार की परिमार्जनविहीन जीवन शैली अपनाते हुए हम अपना बहुमूल्य समय व्यतीत कर देते हैं | कभी हमने यह सोचने की कोशिश नहीं करतें कि हमारे अंदर कौन कौन सी शक्तियां हैं, कौन-कौन से गुण हैं, कौन-कौन सा ज्ञान है | बस ज्ञान के अभाव ने हमको गलत मार्ग पर डाल दिया है और हम निरंतर समय व्यतीत करते हुए लक्ष्यहीन मार्ग पर चले जा रहे हैं  | कुछ बातें पक्की है जैसे हमको मरना है उसी तरह यह भी पक्का है कि हम जो भी योग्यता विशेषता काबिलियत अर्जित कर रहे हैं वह हमारी अकेले के उपयोग के लिए नहीं है वरन संपूर्ण विश्व के लिए है, विश्व की सेवा के लिए है और उस से प्राप्त होने वाला प्रतिफल भी हमारा नहीं है  | प्रतिफल भी हमको हम से नीचे के लोगों में वितरित करना होता है कहीं कर्ज को चुकाने में, कहीं फर्ज के चुकाने में, कहीं मान प्रतिष्ठा के  लिए |  इसलिए हम यह मानकर चलें कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह सिर्फ मानव सेवा के लिए सिर्फ विश्व की सेवा के लिए और विश्व की तरफ कदम बढ़ाने के लिए हे इसको हम दूसरे शब्दों में यह कहे कि आपको जन्म लेने के बाद विश्व में प्रगति के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यकता होती है वह आपको माता पिता से गुरु से और ईश्वर से प्राप्त होती है | जब आप परिपक्व हो जाते हैं तब आप संचित की गई उर्जा को नियोजित करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप आपको प्रतिफल प्राप्त होता है | यह भी ऊर्जा ही है जो आप अपनी अदृश्य आंतरिक शक्ति को भौतिक स्वरूप में परिवर्तित करके प्राप्त करते हैं | यह  भौतिक रूप ही धन या संपत्ति कहलाता है | यह उतनी ही मात्रा में ठीक होता है जितना हमारी आवश्यकता पूर्ति के लिए उचित और न्याय संगत हो इससे अधिक लोभ लालच आपको पतन के गर्त में ले जाता है | आवश्यकता से अधिक संग्रह मात्र पहरेदार बना देता है,  उपयोग कम होता या नहीं होता है | एक समय ऐसा आता है जब आप इस संसार को छोड़कर चले जाते हैं और वह संग्रहित ऊर्जा बिखर जाती है वितरित हो जाती है या लूट ली जाती है इसलिए हम इतना ही संग्रह करें जितना हमारी आवश्यकता के लिए उचित हो | इसलिए हमारे तीन आयामों में निहित अद्भुत शक्तियों का अनुसन्धान और उचित इस्तेमाल करे | 

- आलोक सोनी 

Tuesday, 26 February 2019

विद्या-३ : शरीर के आयाम

शरीर के आयाम 

 
विद्या-३ 


       मनुष्य की शक्ति उसके शरीर के तीन आयामों में विभाजित होती है | तीनो आयामों के स्वरुप, प्रकृति और कार्य भिन्न भिन्न है | इन तीनो आयामों में प्रत्येक में मन को स्थित करना और उस आयाम का अनुसन्धान करना चाहिए | इस विद्याभ्यास से मनुष्य का जीवन निर्बाध और शांत हो जाता हे | 
आइये  आयामों को जानने की विद्या का अभ्यास करतें है | 

 -  शरीर  आयाम  विद्या का अभ्यास -


शर्त -   स्वयं की आतंरिक शक्तियों को जानने की जिज्ञासा हो |  नियमित अभ्यास करने की इच्छा हो एकांत स्थानआरामदायक वस्त्र हों,  पद्मासन में बैठेंदोनों हाथ ध्यान मुद्रा मेंरीढ़ सीधीगर्दन सीधी | 

अभ्यास -  मन केवल "स्वयं" पर केंद्रित | ऐसा मानो इस दुनिया में आप अकेले हो | किसी दूसरे मनुष्य की कल्पना न करें |
        आँखे बंद करेंशरीर के तीन भागों स्थूल, सूक्ष्म और कारण की धारणा करें |  इसके बाद - 
१- स्थूल शरीर पर ध्यान करे | पैर की प्रत्येक अंगुली से प्रारम्भ करते हुए सिर तक सभी अंगो-भागों के आंतरिक और बाहरी संरचना को एक-एक मिनट तक अंतर्दृष्टि से देखें | यह अनुसन्धान करे कि वह भाग-अंग किस शक्ति से कार्य कर रहा है और क्या कार्य कर रहा है | यदि उस भाग-अंग कार्य करना बंद  हो जाये तो उसके परिणामों को भी महसूस करे | 
इसके बाद -----
२- सूक्ष्म शरीर पर ध्यान करे | सूक्ष्म शरीर "मन" है | मन क्या है, कहाँ है - यह अनुसन्धान करें |  मन में विचार-वृत्तियाँ उठ रही हैं, प्रत्येक वृति को देखे, जैसे विद्या-२ अभ्यास में किया था | मन को प्रत्येक इन्द्रिय में स्थित करें और यह देखें की उस इन्द्रिय के संयोग से क्या भाव उत्पन्न हो रहा है, उस संयोग से संसार की ओर जिस शक्ति से मन आकृष्ट हो रहा है, उस शक्ति का अनुसन्धान करें, उस पर नियंत्रण की चेष्टा करें | 
इसके बाद ----
३- कारण शरीर पर ध्यान करें | हम जो भी कार्य करतें उसके औचित्य पर दृष्टी रखनेवाला और कार्य करने या ना करने का संकेत देनेवाला मन में जो दृष्टा है, उसका अनुसन्धान करें | जैसे हम कोई गलत काम करतें है तो मन में भय उत्पन्न करके वह काम न करने का संकेत करता है, अच्छा काम करते हैं तो मन में प्रसन्नता उत्पन्न करके वह काम करने का संकेत करता है | यह दृष्टा ही ईश्वर के अंश रूप में हमारे शरीर में विद्यमान है | इसको कारण शरीर भी कहतें हैं | इसका अनुसन्धान करें - यह कहाँ स्थित है, इसके संकेतों को मानने या न मानने के प्रभावों को महसूस करें | 

समय -  प्रतिदिन सुबह और शाम को 30-30 मिनट निर्धारित समय पर अभ्यास करें | 

परिणाम -    परिणामों को ध्यान में रखकर इस अभ्यास ना करें इस अभ्यास के परिणाम गुप्त रखे   अभ्यास  अनुभव  हमें अवश्य सूचित करें 

आलोक सोनी 

श्रीविद्योपासना

श्रीविद्योपासना

        आत्मशक्ति ही श्रीविद्या है | आत्मशाक्तुपासना  ही श्री विद्योपासना है | श्रीविद्योपासना के तीन मत है : -
 १-  समयमत  :  वशिष्ठ, शुक्र, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार द्वारा प्रतिपादित पांच शुभागम तंत्रो को "समय मत" कहा जाता है | यह पूर्णतः वैदिक मार्ग है | दाहरकाश के मध्य में "श्रीचक्र" की भावना कर शिव-शक्ति है | कुंडलिनी योग भी इसी के अंतर्गत है | मूलाधार से सहस्रार तक क्रमशः देवी की मानसिक पूजा करना समयाचार है | भगवत्पाद शंकर समयमत को ही मानते थे
 २- कौलमत  :  चौसठ तंत्रो के द्वारा प्रतिपादित कौलमत है | अपनी-अपनी वंशपरम्परा से प्राप्त कुल सम्बन्धी होने के कारन इन तंत्रो को कौल कहते है
 ३- मिश्रमत : चन्द्रकला, ज्योतिष्मती, कलानिधि, कुलार्णव, कुलेश्वरी, भुवनेश्वरी, बार्हस्पत्य और दुर्वासा मत, इन आठ तन्त्र ग्रन्थों में प्रतिपादित मत मिश्रित है | इन आठ तंत्रो को चन्द्रकला विद्याअष्टकं कहा जाता है | इनमे समय और कुल दोनों का समन्वय है | इनमे बाह्य पूजा प्रधान है , अन्तर्याग (मानसिक पूजा) न्यून है |  



-  आलोक सोनी 

Monday, 25 February 2019

परा विद्या और अपरा विद्या

परा विद्या और अपरा विद्या

       मुंडकोपनिषद में दो विद्याएं जानने योग्य बताई गई है - एक परा विद्या और दूसरी अपरा विद्या | ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ये चार वेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष ये छः वेदाङ्ग अपरा विद्या कहे जाते हैं
            जिससे उस अक्षर परमात्मा का ज्ञान होता है वह परा विद्या है | वह जो अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण और चाक्षुषोत्रादिहीन है, इसी प्रकार अपाणिपाद, नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यंत सूक्ष्म और अव्यय है तथा जो सम्पूर्ण भूतों का कारण है उसे लोग सब और देखतें है अर्थात सबके आत्मभूत अक्षरब्रम्ह को जिस विद्या से जाना जाता है वही परा विद्या है

          अपरा विद्या संसार का विषय है | उस संसार का उपशमन मोक्ष परा विद्या का विषय है | अपरा विद्या को पूर्णतः जान लेने पर ही उससे विराग हो सकता है | इस संसार में कोई भी नित्य पदार्थ नहीं है, सारा कर्म अनित्य फल का ही साधन है, इस यथार्थ का अनुभवपूर्वक समुचित ज्ञान होने पर ही मनुष्य संसार से मुख मोड़कर दृढ़ वैराग्य के साथ पारा विद्या की और प्रवृत होता है | पारा विद्या ब्रम्हविद्या ही है | मुंडकोपनिषद के प्रथम मन्त्र में ही कहा गया है की समस्त विद्याओं की आश्रयभूता है ब्रम्हविद्या | ब्रह्मविद्या द्वारा ही अखंड ब्रह्माकारवृत्ति की सिद्धि होती है | मोक्ष का उत्कृष्ट साधन ब्रह्मविद्या है

विद्या-२ : विचारों का स्वरुप


विचारों का स्वरुप

 
विद्या-२


       हमने विद्या-१  विचार दर्शन में यह विचार किया कि हमारे मस्तिष्क में विचारों का अनवरत प्रवाह हो रहा है | एक भी विचार वृत्ति पर हमारा नियंत्रण नहीं है | मस्तिष्क में नकारात्मक विचारों की उत्पत्ति अधिक होती है | विद्या-१ में हमने विचारों की उत्पत्ति कहाँ से हो रही है, उत्पत्ति का कारण के बारे में अभ्यास किया है | आज विद्या-२ में हम अगले चरण का अभ्यास करेंगे | इस चरण में हम विचारों के स्वरुप का अभ्यास करेंगे आतंरिक शक्तियों को जानने के लिए विद्याओं का अभ्यास प्रारम्भ करते  है
 - विचारों के स्वरुप की विद्या का अभ्यास -

शर्त -   स्वयं की आतंरिक शक्तियों को जानने की जिज्ञासा हो नियमित अभ्यास करने की इच्छा हो एकांत स्थानआरामदायक वस्त्र , पद्मासन में बैठेंदोनों हाथ ध्यान मुद्रा मेंरीढ़ सीधीगर्दन सीधी | 

अभ्यास -  मन केवल "स्वयं" पर केंद्रित | ऐसा मानो इस दुनिया में आप अकेले हो | किसी दूसरे मनुष्य की कल्पना न करें |
        आँखे बंद करें, विचारो को देखें -  विचार का स्वरुप क्या हे | ये स्वरुप असतकर्म में प्रवृति होना, अच्छे कर्मों से दूर रहना, प्रमाद होना, मोह, अपवित्रता, अनाचार के कर्म, असत्य कर्म, बुरी इच्छा से कर्म, द्वेष आदि स्वरुप हो सकते है |  बस इसी तरह एक एक विचार के पीछे गुप्तचर की तरह पीछे लगे रहे और यह पता करे कि विचार का स्वरुप क्या है  | यह अभ्यास  क्या और क्यों कर रहे हैं इसका विचार नहीं करे  | 

समय -  प्रतिदिन सुबह और शाम को 30-30 मिनट निर्धारित समय पर अभ्यास करें | 

परिणाम -    परिणामों को ध्यान में रखकर इस अभ्यास ना करें | इस अभ्यास के परिणाम गुप्त रखे   अभ्यास  अनुभव  हमें अवश्य सूचित करें

आलोक सोनी 

Sunday, 24 February 2019

वेद, आगम एवं तंत्र

वेद, आगम एवं तंत्र

सम्पूर्ण सनातन धर्म का मूल वेद है | वेद ईश्वर की वाणी है | श्रवण किया होने के कारन वेद को श्रुति कहते है | ईश्वर के मुख से निर्गत होने के कारण  वेद को निगम भी कहा जाता है | वेद चार है - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद  प्रत्येक वेद के तीन विभाग माने जाते है - १-संहिता, २-ब्राह्मण ३-आरण्यक या उपनिषद | विषय की दृष्टि से वेदों को तीन श्रेणी में रखा जाता है जो तीन कांड कहलाते है - कर्मकांड, उपासनाकाण्ड और ज्ञान कांड
आगम का अर्थ है परंपरा से आये हुए सिद्धांत, महापुरुषों के उपदेश इत्यादि | आगम के समस्त सिद्धांत वेद के सिद्धांतो पर ही आधारित है | अगम को वेद के उपासनाकाण्ड का क्रियात्मक पक्ष मन जा सकता है | विभिन्न देवताओं की उपासना के निमित्त भिन्न-भिन्न सम्प्र्दायानुसार आगम-शास्त्रों की सृष्ट्रि हुई | अट्ठाइस शैवागम, एकसौआठ वैष्णवागम, तेरह शाक्तागम प्रसिद्ध है | प्रतीत होता की सभी आगमों के लिए तंत्र शब्द का प्रयोग साधारण था
उपासना की तीन विधियां हैं - वैदिक, तांत्रिक और मिश्रित | यहाँ जो तांत्रिक शब्द आया हे उसका तात्पर्य आगमशास्त्र ही है | कालांतर में तंत्र शब्द का प्रयोग विशेषकर शाक्तागम ग्रंथों के लिए होने लगा | वैष्णवागम ग्रंथों को संहिता या भगवतशास्त्र कहने लगे, शैवागमों का नाम यथावत रहा
तंत्र का साधारण अर्थ है - विधि, प्रणाली, पद्धति इत्यादि | परन्तु उपासना सम्बन्धी शास्त्रों के सन्दर्भ में तंत्र का विशेष अर्थ है | संस्कृत में ज्ञान का विस्तार होने के कारण उपासना सम्बंधित शास्त्रों को तंत्र कहा जाता है | अन्य अर्थ यह भी बताया जाता है कि यह शास्त्र तत्व तथा मन्त्रों का विस्तृत ज्ञान प्रदान कर जीव का त्राण करता है, अतः तंत्र कहा जाता  है

आलोक सोनी 

Saturday, 23 February 2019

सुप्रसिद्ध विद्या केंद्र

सुप्रसिद्ध विद्या केंद्र


       भारतवर्ष में काशी के अतिरिक्त चार विख्यात प्राचीन विद्याकेन्द्र थे -  उत्तर में गांधार के पास तक्षशिलापूर्व में पटना के पास नालंदापश्चिम में काठियावाड़ (गुजरात)  में वल्लभी और दक्षिण में काञ्ची | काञ्ची का घटिका स्थान सम्पूर्ण देश में प्रसिद्ध था | एक बड़े गुरुकुल विश्वविद्यालय  घटिकास्थान कहते थे | वंहा  वेद-वेदांग के साथ संस्कृत साहित्यदर्शनकला इत्यादि  समस्त विद्याओं  का उच्चतम स्तर  तक अध्ययन और अध्यापन  होता था |  एक शिलालेख से ज्ञात होता है  कि घटिकास्थान में सात सहस्त्र विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते रहे | घटिकास्थान में परीक्षा देकर पुरस्कार पाने के उद्देश्य से देश के विभिन्न भागों से अच्छे विद्वान् भी आते रहे |  कहा जाता है कि इस विद्या केंद्र में परीक्षा लेने का ढंग अनूठा था | विद्यालय परीक्षा भवन के एक कक्ष में तालपत्रों में लिखे गए प्रश्नपत्रों से पूरित अनेक घड़े रखे रहते थे | प्रत्येक शास्त्र के लिए पृथक घड़ा निर्धारित होता था | उसी घड़े में उस शास्त्र से सम्बंधित सभी सम्भाव्य प्रश्नपत्र एकत्र कर लिए जाते थे | परीक्षार्थी जिस शास्त्र में परीक्षा देना चाहता हो तदीय घटिका से उसे एक प्रश्नपत्र परीक्षा मंडल की उपस्थिति में निकालकर देना पड़ता था | उसी प्रश्नपत्र के आधार पर परीक्षा मंडल उसकी मौखिक परीक्षा लेती थी | परीक्षार्थी को अपनी विद्वत्ता, प्रतिभानिपुणता इत्यादि को प्रदर्शित करने का सुअवसर  प्राप्त होता था | उसे पूरा प्रोत्साहन मिलता था | | घटिकास्थान में सम्मान पाना अत्यंत गौरव की बात मानी जाती थी | हो सकता है कि परीक्षा की इस प्रणाली के कारण काञ्ची का विश्वविद्यालय घटिकास्थान के नाम से प्रसिद्ध हो गया हो | 

       परन्तु एक अन्य कारण भी है | काञ्ची खगोल-विज्ञान, गणित-ज्योतिष तथा तत्सम्बन्धी शास्त्रों के अध्ययन के लिए प्रसिद्ध था | आकाश-मंडल में स्थित ग्रहों, नक्षत्रों आदि का ज्ञान प्राप्त करने के लिए वहां एक वेधशाला भी थी | वेधशाला में यंत्रों की सहायता से गृह-नक्षत्रों को देखा जाता था | एक घटिका यन्त्र (जलघट) भी होता था जिससे दिन की घड़ियाँ गिनी जाती थीं | समय की गणना विपल, पल एवं घटिका में होती थी | घटिका-स्थान को याम्योत्तर मध्य देशांतर मानकर सारी गणना की जाती थी और पंचांग का निर्माण होता था | संक्षेप में काञ्ची की वेधशाला-घटिकास्थान का भारतवर्ष में उन दिनों वही महत्त्व था जो आजकल लन्दन स्थित ग्रीनविच का है
                                                - आलोक सोनी