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Tuesday, 5 March 2019

चार आर्यसत्य


चार आर्यसत्य


                     इसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता की जगत में दुःख है, परन्तु प्रत्येक व्यक्ति यही सोचता रहता है की मेरा दुःख कैसे नष्ट होगा | उसके फलस्वरूप हर कोई दूसरे का नाश करके भी स्वयं सुखी होना चाहता है | उनमे जो हिंसक और बुद्धिमान होते हैं वे नेता बनते हैं और दूसरों को उनके अधीन रहना पड़ता है | हिंसक बुद्धि के कारण इन नेताओं का संगठन भी नहीं रहता और उन्हें सबसे अधिक हिंसक बुद्धिमान नेता को अपना राजा बनाकर उसकी मर्जी पर चलना पड़ता है | इस प्रकार मनुष्यों और अन्य पशुओं के लिए उपद्रवकारी  समाज रचना को नष्ट करके उसके स्थान पर दूसरा हितसुखकारी संगठन खड़ा करना हो तो हरेक को यह भान होना चाहिए कि उसका और दूसरों का दुःख एक है | इसीलिए भगवान बुद्ध ने पहले आर्यसत्य में सर्वसाधारण दुःख का समावेश किया | इसको चार आर्यसत्यों के स्पष्टीकरण से बताया है  | बुद्ध ने यह दिखा दिया की दुःख का असली कारण आत्मा या प्रकृति नहीं बल्कि मनुष्य की तृष्णा है | पूर्वजन्म और इस जन्म के कारण ही सारा दुःख उत्पन्न होता है | तृष्णा कहाँ से आई, यह प्रश्न निरर्थक है | जब तक तृष्णा है तब तक दुःख उत्पन्न होता ही रहेगा, यह दूसरा आर्यसत्य है | तीसरा आर्यसत्य यह है की तृष्णा का नाश करने से ही मनुष्य दुःख से मुक्त होता है | और तृष्णा-नाश का उपाय है दो अंतो के बीच से जाने वाला अष्टांगिक मार्ग - यह चौथा आर्यसत्य है  

- आलोक सोनी