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Thursday, 7 March 2019

अष्टांगिक मार्ग

अष्टांगिक मार्ग


       अष्टांगिक मार्ग पहली सीढ़ी है "सम्यक दृष्टी " | सम्यक दृष्टी यानि चार आर्य सत्यों का ज्ञान | जगत में दुःख भरा है | मनुष्य जाति की तीव्र तृष्णा का क्षय करने से सबको शांति मिलना संभव है और एक-दूसरे के साथ काया, वाचा, और मनसा सदाचार, सत्य, प्रेम तथा आस्था से साथ बर्ताव करना यह आर्य अष्टांगिक मार्ग उस शांति का मार्ग है | यदि ऐसी सम्यक दृष्टी लोगो में उत्पन्न नहीं हुई तो अहंकार एवं स्वार्थ के कारण होनेवाले झगड़े ख़त्म नहीं होंगे और विश्व को शांति नहीं मिलेगी
       अपना ऐश्वर्य एवं सत्ता बढ़ाने का संकल्प यदि प्रत्येक व्यक्ति करे तो उससे उसकी तथा औरों की समान ही हानि होगी | अतः कामोपभोग में बुद्ध न होने, औरों से साथ पूर्ण मैत्री करने और दूसरों के सुख-संतोष में वृद्धि करने का शुद्ध संकल्प मन में रखना उचित है  | 
        असत्य भाषण, चुगली, गली, वृथा बकबक अदि असत वाणी के कारण समाज का संगठन बिखर जाता है और झगड़े खड़े होकर हिंसा का कारण बनते है | अतः सत्य, परस्पर सख्य साधने वाला, प्रिय एवं मित भाषण करना उचित है | इसीको सम्यक वाचा कहतें है
       प्राणघात, चोरी, व्यभिचार आदि कर्म काया के द्वारा हो जाएँ तो उससे समाज में बड़े अनर्थ होंगे | अतः प्राणघात, चोरी, व्यभिचार आदि कर्मों से अलिप्त रहकर ऐसे ही के-कर्मों का आचरण करना चाहिए, जिनसे लोगों का कल्याण होगा | इसीको सम्यक कर्मान्त कहतें है
      सम्यक आजीव  अर्थ है, अपनी उपजीविका इस  जिससे समाज को हानि न पहुचें  | ऐसे व्यवसाय वर्ज्य करके शुद्ध एवं सरल व्यवहार से अपनी उपजीविका का चलना ही सम्यक आजीव है
        जो बुरे विचार  मन में आये, उन्हें मन में आने के लिए अवसर[ जो बुरे विचार मन में आये उनका नाश करना, जो सुविचार मन में उत्पन्न न हुए हों, उन्हें उत्पन्न करने की चेष्टा करना | और जो सुविचार मन में उत्पन्न हुए हों उन्हें बढ़ाकर पूर्णता तक पहुंचने की चेष्टा करना - इन चार मानसिक प्रयत्नों  को सम्यक व्यायाम कहतें हैं
       शरीर अपवित्र पदार्थों का हुआ है, यह विवेक जागृत रखना, शरीर की सुख-दुःखादि वेदनाओं का बारबार अवलोकन करना एवं इन्द्रियों एवं उनके विषयों से कौन-से बंधन उत्पन्न होतें हैं तथा उनका नाश कैसे किया जा सकता है आदि मनोधर्मों का अच्छा विचार करना - यही सम्यक स्मृति है
      अपने शरीर पर, मृत शरीर पर, मैत्री करुणा आदि मनोवृत्तियों पर अथवा पृथ्वी , अपतेज आदि पदार्थों पर चित्त चित्त एकाग्र करके चार ध्यानों का संपादन करना ही सम्यक समाधि है
      दो अंतो तक न जाकर इस माध्यम मार्ग की भावना करनी चाहिए  पहला अंत है कामोपभोग में सुख न मानना | दूसरा अंत देह दंडन का है | अष्टांगिक मार्ग के सब अंग इन दो अंतो को वर्ज्य करतें हैं

        मौज उड़ाना विलासी लोगों की दृष्टी है और उपोषणादि से शरीर को कष्ट देना तपस्वियों की दृष्टी है | इन दोनों  बीच की दृष्टी चार आर्यसत्यों का ज्ञान, इसी प्रकार अन्य अंगों की भी मध्यवर्तिता जाननी चाहिए |  
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