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Monday, 4 March 2019

दुखों की कारण परंपरा


       दुखों की कारण परंपरा


     मनुष्य के जीवन से दुखों को दूर करने के लिए आध्यात्मिक क्षेत्र में रूचि रखनेवाले व्यक्तियों के लिए कई जिज्ञासायें  उत्पन्न होती है साधना कहाँ से शुरू करें और कहाँ तक जाना हैयह किन-किन मार्गों से होकर गुजरती हैक्या करना होता है, ऐसे कई प्रश्न मन में उठते हैं | आध्यात्मिक क्षेत्र में सिद्धांत स्थापित करनेवाले महान विभूतियों में भगवान बुद्ध हैं | भगवान बुद्ध ने कठोर साधना से उच्च स्थिति प्राप्त की है उनकी साधन-परंपरा में प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत के मार्ग से प्रकाश प्राप्त करना चाहिए | बौद्धदर्शन के अनुसार मनुष्य जीवन में दुःखों की बड़ी कारण परंपरा होती है |  किस तत्व से कौनसे तत्व उत्पन्न होतें हैं | संक्षेप में इस प्रकार हैं - 

अविद्या से संस्कार
संस्कारों से विज्ञान
विज्ञान से नामरूप
नामरूप से षडायातन
षडायातन से स्पर्श
स्पर्श से वेदना
वेदना से तृष्णा
तृष्णा से उपादान
उपादान से भव
भव से जाति (जन्म)
और
जाति से जरा, मरण, शोक, परिदेवन, दुःख, दौर्मनस्य, उपायास
उत्पन्न होते हैं |

पूर्ण वैराग्य से अविद्या का निरोध करने पर संस्कारों का निरोध होता है |
संस्कारों के निरोध से विज्ञानं का निरोध होता है |
विज्ञान के निरोध से नामरूप का निरोध होता है |
नामरूप के निरोध से षडायातन का निरोध होता है |
षडायातन के निरोध से स्पर्श का निरोध होता है |
स्पर्श के निरोध से वेदना का निरोध होता है |
वेदना के निरोध से तृष्णा का निरोध होता है |
तृष्णा के निरोध से उपादान का निरोध होता है |
उपादान के निरोध से भव का निरोध होता है |
भव के निरोध से जाति (जन्म) का निरोध होता है |
और

जाति के निरोध से  जरा, मरण, शोक, परिदेवन, दुःख, दौर्मनस्य, उपायास का निरोध होता है |

                                                                       - आलोक सोनी 














Tuesday, 26 February 2019

श्रीविद्योपासना

श्रीविद्योपासना

        आत्मशक्ति ही श्रीविद्या है | आत्मशाक्तुपासना  ही श्री विद्योपासना है | श्रीविद्योपासना के तीन मत है : -
 १-  समयमत  :  वशिष्ठ, शुक्र, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार द्वारा प्रतिपादित पांच शुभागम तंत्रो को "समय मत" कहा जाता है | यह पूर्णतः वैदिक मार्ग है | दाहरकाश के मध्य में "श्रीचक्र" की भावना कर शिव-शक्ति है | कुंडलिनी योग भी इसी के अंतर्गत है | मूलाधार से सहस्रार तक क्रमशः देवी की मानसिक पूजा करना समयाचार है | भगवत्पाद शंकर समयमत को ही मानते थे
 २- कौलमत  :  चौसठ तंत्रो के द्वारा प्रतिपादित कौलमत है | अपनी-अपनी वंशपरम्परा से प्राप्त कुल सम्बन्धी होने के कारन इन तंत्रो को कौल कहते है
 ३- मिश्रमत : चन्द्रकला, ज्योतिष्मती, कलानिधि, कुलार्णव, कुलेश्वरी, भुवनेश्वरी, बार्हस्पत्य और दुर्वासा मत, इन आठ तन्त्र ग्रन्थों में प्रतिपादित मत मिश्रित है | इन आठ तंत्रो को चन्द्रकला विद्याअष्टकं कहा जाता है | इनमे समय और कुल दोनों का समन्वय है | इनमे बाह्य पूजा प्रधान है , अन्तर्याग (मानसिक पूजा) न्यून है |  



-  आलोक सोनी 

Monday, 25 February 2019

परा विद्या और अपरा विद्या

परा विद्या और अपरा विद्या

       मुंडकोपनिषद में दो विद्याएं जानने योग्य बताई गई है - एक परा विद्या और दूसरी अपरा विद्या | ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ये चार वेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष ये छः वेदाङ्ग अपरा विद्या कहे जाते हैं
            जिससे उस अक्षर परमात्मा का ज्ञान होता है वह परा विद्या है | वह जो अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण और चाक्षुषोत्रादिहीन है, इसी प्रकार अपाणिपाद, नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यंत सूक्ष्म और अव्यय है तथा जो सम्पूर्ण भूतों का कारण है उसे लोग सब और देखतें है अर्थात सबके आत्मभूत अक्षरब्रम्ह को जिस विद्या से जाना जाता है वही परा विद्या है

          अपरा विद्या संसार का विषय है | उस संसार का उपशमन मोक्ष परा विद्या का विषय है | अपरा विद्या को पूर्णतः जान लेने पर ही उससे विराग हो सकता है | इस संसार में कोई भी नित्य पदार्थ नहीं है, सारा कर्म अनित्य फल का ही साधन है, इस यथार्थ का अनुभवपूर्वक समुचित ज्ञान होने पर ही मनुष्य संसार से मुख मोड़कर दृढ़ वैराग्य के साथ पारा विद्या की और प्रवृत होता है | पारा विद्या ब्रम्हविद्या ही है | मुंडकोपनिषद के प्रथम मन्त्र में ही कहा गया है की समस्त विद्याओं की आश्रयभूता है ब्रम्हविद्या | ब्रह्मविद्या द्वारा ही अखंड ब्रह्माकारवृत्ति की सिद्धि होती है | मोक्ष का उत्कृष्ट साधन ब्रह्मविद्या है

Sunday, 24 February 2019

वेद, आगम एवं तंत्र

वेद, आगम एवं तंत्र

सम्पूर्ण सनातन धर्म का मूल वेद है | वेद ईश्वर की वाणी है | श्रवण किया होने के कारन वेद को श्रुति कहते है | ईश्वर के मुख से निर्गत होने के कारण  वेद को निगम भी कहा जाता है | वेद चार है - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद  प्रत्येक वेद के तीन विभाग माने जाते है - १-संहिता, २-ब्राह्मण ३-आरण्यक या उपनिषद | विषय की दृष्टि से वेदों को तीन श्रेणी में रखा जाता है जो तीन कांड कहलाते है - कर्मकांड, उपासनाकाण्ड और ज्ञान कांड
आगम का अर्थ है परंपरा से आये हुए सिद्धांत, महापुरुषों के उपदेश इत्यादि | आगम के समस्त सिद्धांत वेद के सिद्धांतो पर ही आधारित है | अगम को वेद के उपासनाकाण्ड का क्रियात्मक पक्ष मन जा सकता है | विभिन्न देवताओं की उपासना के निमित्त भिन्न-भिन्न सम्प्र्दायानुसार आगम-शास्त्रों की सृष्ट्रि हुई | अट्ठाइस शैवागम, एकसौआठ वैष्णवागम, तेरह शाक्तागम प्रसिद्ध है | प्रतीत होता की सभी आगमों के लिए तंत्र शब्द का प्रयोग साधारण था
उपासना की तीन विधियां हैं - वैदिक, तांत्रिक और मिश्रित | यहाँ जो तांत्रिक शब्द आया हे उसका तात्पर्य आगमशास्त्र ही है | कालांतर में तंत्र शब्द का प्रयोग विशेषकर शाक्तागम ग्रंथों के लिए होने लगा | वैष्णवागम ग्रंथों को संहिता या भगवतशास्त्र कहने लगे, शैवागमों का नाम यथावत रहा
तंत्र का साधारण अर्थ है - विधि, प्रणाली, पद्धति इत्यादि | परन्तु उपासना सम्बन्धी शास्त्रों के सन्दर्भ में तंत्र का विशेष अर्थ है | संस्कृत में ज्ञान का विस्तार होने के कारण उपासना सम्बंधित शास्त्रों को तंत्र कहा जाता है | अन्य अर्थ यह भी बताया जाता है कि यह शास्त्र तत्व तथा मन्त्रों का विस्तृत ज्ञान प्रदान कर जीव का त्राण करता है, अतः तंत्र कहा जाता  है

आलोक सोनी 

Monday, 18 February 2019

दहर नाम से कहा गया तत्व परब्रम्ह का बोधक

दहर नाम से कहा गया तत्व परब्रम्ह का बोधक 

         परमात्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है और महान से भी महान है | वह विशुद्ध आकाश में रहते हुए सूक्ष्म रूप से प्राणियों के ह्रदय गुहा (ह्रदयाकाश) में छिपा हुआ रहता है | मनुष्य का ह्रदय पुण्डरीक कमल के आकार का है और उसके भीतर हृदयाकाश है | ह्रदयाकाश के भीतर ब्रह्म विराजमान है | उसी ब्रह्म को दहर शब्द से प्रकट किया गया है | हृदयस्थ ब्रह्म अत्यंत सूक्ष्म है, प्रकाशमय, गूढ़ है, सत  है, परमतत्व है | दहर शब्द से इन सब का बोध होता है
मनुष्य के शरीर में साधारणतया जिसे हृदय कहा और समझा जाता है उससे उपरोक्त हृदयकमल सर्वथा भिन्न है | महानारायनोपनिषद  में बताया गया है कि कमल की काली जैसा दिखनेवाला यह हृदय अधोमुख होकर गर्दन की हड्डी से निचे और नाभि से ऊपर एक बिता दूर स्थित है | इसके अनुसार हृदय का स्थान वक्षस्थल सुनिश्चित होता है

हृदयाकाश के भीतर छान्दोग्योपनिषद में  कहा गया है की ब्रह्मपुर रूप मनुष्य शरीर  जो सूक्ष्म कमलाकर (दहरम पुंडरिकम ) गृह स्थान है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है उसके भीतर जो वस्तु है उसका अन्वेषण करना चाहिए और उसीकी जिज्ञासा करनी चाहिए | ब्रम्ह की जिज्ञासा और एकाग्रचित्त होकर ध्यानोपासना करते रहने पर आत्मज्ञान प्राप्त हो सकता है | आत्मज्ञानी शोक पार कर  जाता है
                
आलोक सोनी
9425922088