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Monday, 11 March 2019

समत्व योग का व्यवहार




समत्व योग का व्यवहार
          संसार के व्यवहार करने में जिस समय कोई ऐसी जटिल समस्या सामने उपस्थित हो जाती है कि क्या करना उचित होगा ? उस समय दो या उससे अधिक विरोधी धर्मों के संघर्ष का अवसर आ जाता है | जैसा कि अर्जुन के सम्मुख आया था - एक तरफ तो स्वजन बंधुओं से युद्ध करना और दूसरी ओर युद्ध न करने से क्षत्रिय धर्म का नाश यानि अपने कर्तव्य कर्म  से विचलित होनाऐसी परिस्थिति में मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ होकर मोह के दलदल में फँस  जाता है | वह उससे बचने के लिए याने यह तय करने के लिए की सही एवं सत्य क्या है जो कि मुझे करना चाहिए इसके लिए वह नीति और धर्म शास्त्रों द्वारा यह जानना चाहता है अर्थात रास्ता ढूंढने का प्रयत्न करता है लेकिन अपने इस प्रयत्न में शास्त्रों के भेदवाद  के अनेक स्थानों पर परस्पर विरोधी कथनों से उसकी उलझन है सुलझने के बजाय और भी बढ़ जाती है कारण कि उनमें कहीं पर किसी धर्म की विशेषता का कथन मिलता है तो कहीं पर  विरुद्ध धर्म की विशेषता का परस्पर विरोधी ज्ञान मिलता है कहीं दया और अहिंसा की महिमा गाई गई है तो कहीं दुष्टों को दंड देना युद्ध में शत्रुओं को मारना और यज्ञ में पशुओं का वध करना परम धर्म माना गया है कहीं सत्य के बराबर दूसरा कोई धर्म ही नहीं माना है तो दूसरे स्थल पर छलियों  और दुराचारियों  के साथ छल करना न्याय संगत माना है कहीं दान का बड़ा महत्व गाया गया है तो कहीं दान देने से दुर्गति बताई गई है कहीं प्राणी मात्र के साथ मैत्री भाव रखने को कहा गया है तो कहीं पर शठ  और दुर्जनों  के साथ उनके सामान ही शठता आदि का बर्ताव करने की व्यवस्था दी गई है कहीं पर आबाल  ब्रह्मचर्य का अखंड व्रत पालन करने की बहुत बड़ाई की गई है तो कहीं पर संतान पैदा ना करने वालों के लिए नर्क में पड़ना  अनिवार्य बताया गया है कहीं पर माता पिता की भक्ति गाई गई है तो कहीं पर उनके प्रतिकूल आचरण करने वालों की बड़ी प्रशंसा की गई है किसी जगह पर भ्रातृस्नेह  को बहुत सराहा है तो किसी जगह पर विद्रोहियों का बड़ा आदर किया गया है  इस प्रकार से अनंत  प्रकार के भ्रम उत्पन्न करने वाले परस्पर विरोधी वाक्य भेदवाद  के शास्त्रों में पाए जाते हैं और ज्यों-ज्यों  अधिक छानबीन की जाती है त्यों-त्यों  उलझन बढ़ती जाती हैं जिससे साधारण मनुष्य तो ठीक  परंतु अच्छे ज्ञानियों की भी बुद्धि अत्यंत विक्षिप्त हो जाती है और एक निश्चय पर पहुंचना असंभव हो जाता है | 
           इस महान उलझन से पार होकर एक निश्चय पर पहुंचने का एकमात्र उपाय "बुद्धि को सबकी  एकता के साम्य  भाव में स्थित करना है" अर्थात सदा यही विचार करते रहना है कि एक ही आत्मा सब चराचर भूत प्राणियों में समान भाव से व्यापक है उससे अलग या फिर कुछ नहीं है जो छोटे से छोटे जंतु में हैं वहीं बड़ी से बड़ी जगह में है जो एक चरण में है वही ब्रम्हांड में है जो मुझ में है वही दूसरों में हैं इस तरह अभ्यास करते करते बुद्धि जब सर्व भूतों में सामने भाव में जुड़कर निश्चल हो जाती है तब वह भेदभाव की उलझन वाले शास्त्रों  के वाक्यों से विचलित नहीं होती क्योंकि उसकी बुद्धि समस्त ज्ञान में स्थित होकर एक ही आत्मा को सभी चर अचर में व्याप्त देखने के दृढ़ निश्चय पर स्थिर हो जाती है तब उन शास्त्रों में वर्णित तथ्यों का निर्देशों  का उस पर कोई प्रभाव नहीं रहता एवं तब सभी समस्या हल हो कर उस आत्म ज्ञानी पुरुष के लिए सभी व्यवहार सर्व भूतों में साम्य  भाव से होने लग जाते हैं जिन से किसी प्रकार का कोई क्लेश, शोक मोह  एवं बंधन नहीं होता किंतु सदा सर्वदा वह उस सत्य आनंद सच्चिदानंद में ही लीन होकर उस परम सत्य एवं आनंद के धाम को प्राप्त होता है एवं उसके सारे कार्य सभी की भलाई के हेतु स्वयं के स्वार्थ रहित निस्वार्थ भाव से ईश्वर तुल्य होते हैं समत्व योग का व्यवहार करने का इतना महत्व हैं |

Thursday, 7 March 2019

अष्टांगिक मार्ग

अष्टांगिक मार्ग


       अष्टांगिक मार्ग पहली सीढ़ी है "सम्यक दृष्टी " | सम्यक दृष्टी यानि चार आर्य सत्यों का ज्ञान | जगत में दुःख भरा है | मनुष्य जाति की तीव्र तृष्णा का क्षय करने से सबको शांति मिलना संभव है और एक-दूसरे के साथ काया, वाचा, और मनसा सदाचार, सत्य, प्रेम तथा आस्था से साथ बर्ताव करना यह आर्य अष्टांगिक मार्ग उस शांति का मार्ग है | यदि ऐसी सम्यक दृष्टी लोगो में उत्पन्न नहीं हुई तो अहंकार एवं स्वार्थ के कारण होनेवाले झगड़े ख़त्म नहीं होंगे और विश्व को शांति नहीं मिलेगी
       अपना ऐश्वर्य एवं सत्ता बढ़ाने का संकल्प यदि प्रत्येक व्यक्ति करे तो उससे उसकी तथा औरों की समान ही हानि होगी | अतः कामोपभोग में बुद्ध न होने, औरों से साथ पूर्ण मैत्री करने और दूसरों के सुख-संतोष में वृद्धि करने का शुद्ध संकल्प मन में रखना उचित है  | 
        असत्य भाषण, चुगली, गली, वृथा बकबक अदि असत वाणी के कारण समाज का संगठन बिखर जाता है और झगड़े खड़े होकर हिंसा का कारण बनते है | अतः सत्य, परस्पर सख्य साधने वाला, प्रिय एवं मित भाषण करना उचित है | इसीको सम्यक वाचा कहतें है
       प्राणघात, चोरी, व्यभिचार आदि कर्म काया के द्वारा हो जाएँ तो उससे समाज में बड़े अनर्थ होंगे | अतः प्राणघात, चोरी, व्यभिचार आदि कर्मों से अलिप्त रहकर ऐसे ही के-कर्मों का आचरण करना चाहिए, जिनसे लोगों का कल्याण होगा | इसीको सम्यक कर्मान्त कहतें है
      सम्यक आजीव  अर्थ है, अपनी उपजीविका इस  जिससे समाज को हानि न पहुचें  | ऐसे व्यवसाय वर्ज्य करके शुद्ध एवं सरल व्यवहार से अपनी उपजीविका का चलना ही सम्यक आजीव है
        जो बुरे विचार  मन में आये, उन्हें मन में आने के लिए अवसर[ जो बुरे विचार मन में आये उनका नाश करना, जो सुविचार मन में उत्पन्न न हुए हों, उन्हें उत्पन्न करने की चेष्टा करना | और जो सुविचार मन में उत्पन्न हुए हों उन्हें बढ़ाकर पूर्णता तक पहुंचने की चेष्टा करना - इन चार मानसिक प्रयत्नों  को सम्यक व्यायाम कहतें हैं
       शरीर अपवित्र पदार्थों का हुआ है, यह विवेक जागृत रखना, शरीर की सुख-दुःखादि वेदनाओं का बारबार अवलोकन करना एवं इन्द्रियों एवं उनके विषयों से कौन-से बंधन उत्पन्न होतें हैं तथा उनका नाश कैसे किया जा सकता है आदि मनोधर्मों का अच्छा विचार करना - यही सम्यक स्मृति है
      अपने शरीर पर, मृत शरीर पर, मैत्री करुणा आदि मनोवृत्तियों पर अथवा पृथ्वी , अपतेज आदि पदार्थों पर चित्त चित्त एकाग्र करके चार ध्यानों का संपादन करना ही सम्यक समाधि है
      दो अंतो तक न जाकर इस माध्यम मार्ग की भावना करनी चाहिए  पहला अंत है कामोपभोग में सुख न मानना | दूसरा अंत देह दंडन का है | अष्टांगिक मार्ग के सब अंग इन दो अंतो को वर्ज्य करतें हैं

        मौज उड़ाना विलासी लोगों की दृष्टी है और उपोषणादि से शरीर को कष्ट देना तपस्वियों की दृष्टी है | इन दोनों  बीच की दृष्टी चार आर्यसत्यों का ज्ञान, इसी प्रकार अन्य अंगों की भी मध्यवर्तिता जाननी चाहिए |  
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Wednesday, 27 February 2019

निर्बाध और शांत जीवन

            
निर्बाध और शांत जीवन

       साथियों आज हम निर्बाध और शांत जीवन के निर्माण की बात करेंगे |  पहला सूत्र यह है कि क्या हमने अपने शरीर के आयामों को या स्तरों को समझ लिया है यदि नहीं तो आज सबसे पहले हमको अपने शरीर के विभिन्न स्तरों को समझ लेना होगा तभी हमारी प्रगति की आधारशिला को हम जान सकेंगे | 
      यही नहीं जीवन में प्रगति के कोई भी सोपान हो कोई भी लक्ष्य हो कोई भी उद्देश्य हो उसको पाने के लिए हमारी सफलता इस आधारशिला को जानने में समझने में निहित है कि हम अपने शरीर के विभिन्न स्तरों को जानलें | इसके लिए कुछ अभ्यास की आवश्यकता होगी, थोड़ा धीरज रखना होगा और हमारे मन की कुछ धारणाओं में परिवर्तन करना होगा |  सबसे पहला अभ्यास यह है कि हम अंतर्मुखी को कर अपने शरीर के तीन आयामों को देखें पहला आयाम है स्थूल शरीर दूसरा आयाम सूक्ष्म शरीर है तीसरा आयाम कारण शरीर है हम इन तीनों शरीरों के कार्यों दायित्व और परिणामों पर सूक्ष्म रूप से विचार करेंगे और अभ्यास के माध्यम से अपनी धारणा को मजबूत करेंगे दृढ़ से करेंगे यह अभ्यास बहुत लंबे समय तक निरंतर उसके अंगों और उपांग सहित अभ्यास करना होगा | इस अभ्यास के पहले हम शरीर के तीनों आयामों को विस्तृत रूप से समझेंगे और उसके बाद नई धारणा स्थापित करेंगे जो वास्तविक धारणा होगी और हमारी प्रगति के लिए ऐसे मजबूत ढांचे के रूप में कार्य करेगी जिससे हमको किसी भी लक्ष्य में और किसी भी दिशा में सफलता देगी | 
      साथियों एक उदहारण के माध्यम से इस अभ्यास की तुलना करते है, जैसे कार स्टार्ट करने के लिए दो तरीके होते हैं पहला चाबी लगाकर कार स्टार्ट करना और दूसरा कार को धक्का देकर स्टार्ट करना | इन दोनों में क्या फर्क है इस फर्क को हम स्वयं के ऊपर देखेंगे | वर्तमान समय में मोटिवेशन कोर्स के रूप में लोगों को टिप्स दी जाती है की ऐसा करिए वैसा करिए और इसका अभ्यास निरंतर करिए तो आप इसके आदी हो जाएंगे और कठिनाइयों पर सफलता प्राप्त कर सकेंगे यह तरीका कार को धक्का देकर स्टार्ट करने की तरह है दूसरा तरीका जब व्यक्ति खुद का आकलन करता है खुद की आदतो और कमियों का परीक्षण करके उनको दूर करने की विधि सम्मत प्रक्रियाओं से अभ्यास करता है |  इसके साथ ही वह अपने अंदर के गुण और विशेषताओं को परिमार्जित करता है तब ऐसे आंतरिक अभ्यास से व्यक्तित्व का विकास गतिमान होता है यह कार को चाबी लगाकर स्टार्ट करने की तरह है |  
        प्रगति के लिए उन्नति के लिए जो साधन सुविधाएं उपलब्ध हैं उनका बेहतर तरीके से उपयोग करें और उनका दोहन करके अपनी योग्यता को बढ़ाएं या उन सुविधाओं का दुरुपयोग करके उपेक्षा करके और उन को नष्ट कर दें यह हमारी सोच पर निर्भर है |  हम भौतिक शरीर में दिखाई देने वाली शक्तियों आकलन करते हैं, जबकि ईश्वर ने हमको शरीर के अंदर भी अद्भुत शक्तियां दी है, अद्भुत ज्ञान दिया है किंतु हम अज्ञानतावश इन शक्तियों को विभिन्न दोषों से ढक देते हैं और यह सोचते हैं कि हमको ऐसी शक्ति अर्जित करना है वैसे योग्यता अर्जित करना है, जबकि दुनिया की हर शक्ति, काबिलियत और योग्यता हमारे अंदर ही मौजूद है | इस प्रकार की परिमार्जनविहीन जीवन शैली अपनाते हुए हम अपना बहुमूल्य समय व्यतीत कर देते हैं | कभी हमने यह सोचने की कोशिश नहीं करतें कि हमारे अंदर कौन कौन सी शक्तियां हैं, कौन-कौन से गुण हैं, कौन-कौन सा ज्ञान है | बस ज्ञान के अभाव ने हमको गलत मार्ग पर डाल दिया है और हम निरंतर समय व्यतीत करते हुए लक्ष्यहीन मार्ग पर चले जा रहे हैं  | कुछ बातें पक्की है जैसे हमको मरना है उसी तरह यह भी पक्का है कि हम जो भी योग्यता विशेषता काबिलियत अर्जित कर रहे हैं वह हमारी अकेले के उपयोग के लिए नहीं है वरन संपूर्ण विश्व के लिए है, विश्व की सेवा के लिए है और उस से प्राप्त होने वाला प्रतिफल भी हमारा नहीं है  | प्रतिफल भी हमको हम से नीचे के लोगों में वितरित करना होता है कहीं कर्ज को चुकाने में, कहीं फर्ज के चुकाने में, कहीं मान प्रतिष्ठा के  लिए |  इसलिए हम यह मानकर चलें कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह सिर्फ मानव सेवा के लिए सिर्फ विश्व की सेवा के लिए और विश्व की तरफ कदम बढ़ाने के लिए हे इसको हम दूसरे शब्दों में यह कहे कि आपको जन्म लेने के बाद विश्व में प्रगति के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यकता होती है वह आपको माता पिता से गुरु से और ईश्वर से प्राप्त होती है | जब आप परिपक्व हो जाते हैं तब आप संचित की गई उर्जा को नियोजित करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप आपको प्रतिफल प्राप्त होता है | यह भी ऊर्जा ही है जो आप अपनी अदृश्य आंतरिक शक्ति को भौतिक स्वरूप में परिवर्तित करके प्राप्त करते हैं | यह  भौतिक रूप ही धन या संपत्ति कहलाता है | यह उतनी ही मात्रा में ठीक होता है जितना हमारी आवश्यकता पूर्ति के लिए उचित और न्याय संगत हो इससे अधिक लोभ लालच आपको पतन के गर्त में ले जाता है | आवश्यकता से अधिक संग्रह मात्र पहरेदार बना देता है,  उपयोग कम होता या नहीं होता है | एक समय ऐसा आता है जब आप इस संसार को छोड़कर चले जाते हैं और वह संग्रहित ऊर्जा बिखर जाती है वितरित हो जाती है या लूट ली जाती है इसलिए हम इतना ही संग्रह करें जितना हमारी आवश्यकता के लिए उचित हो | इसलिए हमारे तीन आयामों में निहित अद्भुत शक्तियों का अनुसन्धान और उचित इस्तेमाल करे | 

- आलोक सोनी 

Thursday, 14 February 2019

विद्या का लाभ


विद्या का लाभ 

      मनुष्य का बचपन उसके जीवन का महत्वपूर्ण भाग होता है, इस भाग में उसके जीवन के आकार और प्रगति के बीज बोये जाते हैं इस भाग में उसको शिक्षा से अधिक विद्या की जरुरत होती है, यह विद्या मन में संस्कारों के बीज बनकर अंकुरित और पल्लवित होती है किशोर अवस्था में ये संस्कार वृक्ष की तरह विस्तार पाते हैं और उसी अनुरूप जीवन आकार लेते हुए प्रगति करने लगता है  बचपन में जो भी विद्या ग्रहण की जाती है आजीवन रहती है इसी काल में माता-पिता और गुरु का कर्तव्य होता है की अबोध बालक के जीवन के आकार और लक्ष्य को दिशा देने के लिए शिक्षा और विद्या में अंतर का बोध रखें जो भूमि और आकाश की भांति है | शिक्षा सूचनाओं का संकलन मात्र है जबकि विद्या जीवन को आकार देने और उर्जा देने की अदृश्य और महान  शक्ति है | देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बालक को विद्या प्रदान करने का क्रम प्रारंभ होता और जीवन के अंत में इसका परिणाम प्राप्त होता है | परिणाम सारभूत शब्दों में व्यक्त होता है जैसे जीवन अच्छा जिया या नहीं, स्वार्थी थे या परमार्थी थे, नैतिक  या  अनैतिक रहे, लोभी रहे या दानी रहे, पापी रहे या धर्मात्मा रहे आदि आदि | यदि परिणाम को लक्ष्य बनाकर चलें तो जीवन में कर्तव्य और कर्म भी उसी के अनुरूप धारण करने होंगे | मानव जीवन की सफलता की कुँजी कर्म और परिणाम पर आधारित होती है | भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में सूत्र दिया है की मानव को केवल कर्म करने की स्वतंत्रता है, परिणाम देना ईश्वर की शक्ति में है, मानव परिणाम पर दृष्टी न रखकर कर्म पर दृष्टी रखे | जब कर्मो का क्रम सामान होगा तो उसी अनुरूप परिणाम स्वतः प्राप्त होंगें | इसमें भावना यह है की यदि उत्तम कर्म होंगे तो परिणाम भी उत्तम होंगे | उत्तम कर्म के लिए बीज भी उत्तम बोया जाना चाहिए, मानव जीवन में बीज से आशय उसके मस्तिष्क में प्रविष्ट किये जानेवाले विचारों से है | उत्तम विचारों को मन में प्रविष्ट करवाना, उत्तम योजनाओं को, सेवा करने की भावना को, प्राणियों की सेवा करने के विचारों का चिंतन और मनन, निदिध्यासन आदि विधि के अभ्यास से मन में उत्तम विचारों की वृत्तियाँ समुद्र की लहरों की भांति हिलोरे लेने लगेगी और निरंतर स्पंदनों से मन की ग्रंथियों में संस्कार निर्मित होंगे | बालक पूर्वजन्म के संस्कारों और वर्तमान जन्म के माता-पिता से प्राप्त संस्कारों के प्रभाव से स्वाभाविक रूप से जिन कर्मों के प्रति रूचि प्रकट करता है उसी के अनुसार उसके लिए कर्मक्षेत्र तय करना उत्तम होता है | रूचि के अनुरूप कर्म की विद्या उसको प्रदान की जानी चाहिए | माता-पिता और गुरु उसकी विद्या ग्रहण करने क्षमता का आकलन करते हुए विद्याभ्यास का क्रम और अवधि तय करें ताकि वह विद्या के गहन और गूढ़ तत्वों को भलीभांति ग्रहण कर सके और किशोरावस्था में आने पर सहज रूप से जीवन को पल्लवित और पुष्पित कर सके
aवर्तमान परिप्रेक्ष्य में माता पिता और गुरुजनों को विचार और चिंतन मनन करना होगा की बालक के जीवन को उन्नत बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहता है और इसका परिणाम और लाभ भी इस देश को, उस नगर को, उस ग्राम को और उन माता-पिता को ही प्राप्त होना चाहिए | भारत के सभी बालक यहाँ की उत्तम विद्याओं को ग्रहण कर इसी महान देश के वातावरण में रहें और माता-पिता और देश की सेवा करें   

Sunday, 10 February 2019

प्रत्येक क्षण अध्ययन और साधना का क्षण बने


प्रत्येक क्षण अध्ययन और साधना का क्षण बने 


       हमारे जीवन में प्रत्येक क्षण अध्ययन और साधना का क्षण रहे यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए | जब हमारा यह अभ्यास सुदृढ़ हो जायेगा तो हमको अंतर्जगत का ज्ञान होने लगेगा और अंतःशक्तियों को पहचानने का ज्ञान  मिलेगा | हमारे इस ज्ञान की तरंगों की अविरल प्रवाह का तप देखकर ही  हमारे गुरु हमको मार्गदर्शन करते करते हमको अद्भुत स्थिति में ले जाते हैं | गुरु का ज्ञान अलौकिक होता है, हम सांसारिक शब्दों और भावनाओं के मापदंड पर उनकी गहराई नहीं माप सकते हैं | गुरु की कृपा हमारे जीवन में सहज और सरल रूप में समा जाती है, उनकी कृपा आ जाती है, इसका अनुभव हमको परिपक्व होने पर ही होता है | सांसारिक जीवन में हम सुख और सफलता की प्राप्ति के लिए कठिन परिश्रम करते है, दृढ़ विश्वास रखकर आगे बढ़ते हैं किन्तु आध्यात्मिक जीवन में सफलता के लिए गुरु के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है | गुरु की शक्ति हमारी पहुँच के बाहर होती है, उनके अनुभव हमारी पहुँच के बाहर होते है, इसलिए अहंकार और आकांक्षाओं से मुक्त रहकर ही हम उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं | उनके आध्यात्मिक चमत्कार और रहस्य समय-समय पर हमारे अनुभव में आते हैं, वहां हमको स्थिर और दृढ़ रहकर, बालसुलभ चेष्टाओं को दूर रखकर, उनके मूल तत्व को समझने का प्रयास करना चाहिए | गुरु बिना किसी स्वार्थ के प्रेम और प्यार देते हैं, बस यहीं हमको निष्काम रहना होगा और उनकी कृपा को पहचानना होगा | सरल और सहज स्वाभाव वाले गुरु अपने ज्ञान को गुप्त रखते है, वे रहस्यमयी योगविद्याओं के ज्ञाता होते हैं, वे हमारे साधना की गहराई को देखते रहते है और दीर्घकाल के बाद ही किसी रहस्य को खोलकर बताते हैं | हमारा जीवन काँटों से भरा होता है, गुरु ही इनके चुभने का दर्द दूर कर सकते हैं | उन काँटों के बीच फूल की तरह सुगन्धित और दिव्य अनभूतियों से भर देते हैं | इन शब्दों में एक मार्ग दिखाने की चेष्टा की गई और विद्या प्राप्ति के लिए किस योग्यता की आवश्यकता है इस पर मनन के लिए प्रेरणा है, वह प्रेरणा जिसकी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यकता है

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Thursday, 15 February 2018

अदृश्य शक्तियों की धारणा



- अदृश्य शक्तियों की धारणा -

                    
        मानव जीवन में शक्ति यानि ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्थान है | यह ऊर्जा भिन्न भिन्न स्थानों पर अलग नामो से पुकारी जाती है |  ये स्थान चाहे मानव शरीर में हो या इस दुनिया में कही पर हो, प्रत्येक स्थान पर उसका नाम है |  भारतीय संस्कृति में शक्ति को केंद्र मानकर ही अतिसूक्ष्म और विशाल खोज हुई |  यह खोज या अनुसन्धान वेद, पुराण, उपनिषद आदि में वर्णित है, इनको हम रिसर्च पेपर या डाक्यूमेंट्स कह सकते हैं ा  विश्व के अनेक विद्वानों ने इनका अध्ययन किया और कई तरह की व्याख्याऐं की है |  किन्तु हम सरल रूप में यह कह सकते है की शक्ति या ऊर्जा को जानना ही  स्वयं को जानना है |  वर्तमान युग की व्यापारिक व्यवस्था में मानव केवल प्रतियोगी बनकर धन के अर्जन और शरीर के सुख भोग को लक्ष्य बनाकर अन्धो की भांति जीवन की दौड़ में शामिल है |  वह स्वयं को जानने के लिए समय नहीं दे पा रहा है |  इसको प्रकारांतर से यह कह सकते है कि वह अस्थिर शक्ति या चलायमान शक्ति के भंवर में फस गया है |  उसको स्थिर शक्ति को जानने के लिए  प्रयास करना होगा |  या यूँ कहिये की उसको शक्तियों के स्थिर और चलायमान स्वरुप को जानना होगा |  शक्ति या ऊर्जा मूलतः एक ही है किन्तु स्थान विशेष पर इसका नाम और कार्य विशिष्ट हो जाता है इसलिए प्रत्येक स्वरुप को उसी रूप में जानना आवश्यक है |  इसलिए विशिष्ट स्थान पर शक्ति की धारणा करना उसके स्वरुप को जानने के लिए आवश्यक है |  भारतीय संस्कृति में धारणा को एक महत्वपूर्ण तत्त्व माना गया है |  इसका अभ्यास किये बिना मानव जीवन की ऊर्जा को जानना कठिन ही नहीं असंभव है |  धारणा यानि किसी शक्ति की किसी स्थान विशेष में उपस्थिति का विश्वास करना, ऐसा विश्वास जिसमे उस शक्ति का गुणधर्म और अदृश्य स्वरुप आपकी कल्पना में जाग्रत रूप में परिलक्षित हो |  सभी धर्मो में, सभी पंथो में, सभी पूजा पद्धतियों में धारणा का तत्व सनातन रूप से विद्यमान है |  यह शक्ति या ऊर्जा को जानने का बीज है |  इसके अभाव में सफलता पाना कठिन है |  इसलिए हमको  अदृश्य शक्तियों की धारणा  का अभ्यास करना चाहिए |  एक एक शक्ति की धारणा और उसके व्यापकता के बारे में अगले लेखो में अवगत  करवाएंगे | 

Friday, 26 January 2018

अदृश्य शक्तियां

- अदृश्य शक्तियां -


         वर्तमान समय तीव्र विकास की दिशा में जा रहा है | वर्तमान समय तीव्र विकास की दिशा में जा रहा है | इस दौर में हम मन की सहज शांति और आनंद को खोते जा रहे है |  ऐसी सम्पदाओं को खो देने के बाद हमारे पास सिर्फ तनाव, अशांति, अनिश्चितता और असफलताओ का आवरण ही शेष बच रहा है |  विचार की बात यह है कि क्या तीव्र विकास के लिए  हर स्तर पर प्रतियोगिता, समय की कमी, प्रत्येक कार्य का मूल्य चुकाना और स्वयं को भूलकर अंधी दौड़ में भागते चले जाना क्या यही हमारी नियति बनती जा रही है | हम क्या भूल रहे है, क्या खो रहे हैं, कौन हमारी अदृश्य रूप से सहायता करते है जिनको हम समझ नहीं पा रहे है यह हमको पुनः स्मरण करना पड़ेगा | क्योकि वर्तमान वातावरण में मन की स्थिति ऐसी हो गई है कि हम स्वयं को ही संप्रभु शक्ति मानने लगे है, यह धारणा बनती जा रही है की जो लक्ष्य तय कर लिया है वह हम खुद के बलबूते पर पा लेंगे | किन्तु हकीकत कुछ और ही है, वह यह  है की आप के पीछे जो अदृश्य शक्तियां है उनको जाने बिना, उनको सम्मान दिए बिना, उनको जीवन में प्रतिष्ठा दिए बिना आप समृद्ध और आनंदित स्थिति प्राप्त नहीं  सकते है  |
अदृश्य शक्तियों को जानना, प्रतिष्ठा देना  और उनका सहयोग प्राप्त करना हमारा कर्तव्य है तभी हम विकसित जीवन का आनंद उठा पाएंगे | इस दौर में हम मन की सहज शांति और आनंद को खोते जा रहे है |  ऐसी सम्पदाओं को खो देने के बाद हमारे पास सिर्फ तनाव, अशांति, अनिश्चितता और असफलताओ का आवरण ही शेष बच रहा है |  विचार की बात यह है कि क्या तीव्र विकास के लिए  हर स्तर पर प्रतियोगिता, समय की कमी, प्रत्येक कार्य का मूल्य चुकाना और स्वयं को भूलकर अंधी दौड़ में भागते चले जाना क्या यही हमारी नियति बनती जा रही है ा हम क्या भूल रहे है, क्या खो रहे हैं, कौन हमारी अदृश्य रूप से सहायता करते है जिनको हम समझ नहीं पा रहे है यह हमको पुनः स्मरण करना पड़ेगा | क्योकि वर्तमान वातावरण में मन की स्थिति ऐसी हो गई है कि हम स्वयं को ही संप्रभु शक्ति मानने लगे है, यह धारणा बनती जा रही है की जो लक्ष्य तय कर लिया है वह हम खुद के बलबूते पर पा लेंगे | किन्तु हकीकत कुछ और ही है, वह यह  है की आप के पीछे जो अदृश्य शक्तियां है उनको जाने बिना, उनको सम्मान दिए बिना, उनको जीवन में प्रतिष्ठा दिए बिना आप समृद्ध और आनंदित स्थिति प्राप्त नहीं  सकते है  |
अदृश्य शक्तियों को जानना, प्रतिष्ठा देना  और उनका सहयोग प्राप्त करना हमारा कर्तव्य है तभी हम विकसित जीवन का आनंद उठा पाएंगे | अगली पोस्ट में आप एक एक करके शक्तियों का परिचय प्राप्त करेंगे |