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Tuesday, 26 February 2019

विद्या-३ : शरीर के आयाम

शरीर के आयाम 

 
विद्या-३ 


       मनुष्य की शक्ति उसके शरीर के तीन आयामों में विभाजित होती है | तीनो आयामों के स्वरुप, प्रकृति और कार्य भिन्न भिन्न है | इन तीनो आयामों में प्रत्येक में मन को स्थित करना और उस आयाम का अनुसन्धान करना चाहिए | इस विद्याभ्यास से मनुष्य का जीवन निर्बाध और शांत हो जाता हे | 
आइये  आयामों को जानने की विद्या का अभ्यास करतें है | 

 -  शरीर  आयाम  विद्या का अभ्यास -


शर्त -   स्वयं की आतंरिक शक्तियों को जानने की जिज्ञासा हो |  नियमित अभ्यास करने की इच्छा हो एकांत स्थानआरामदायक वस्त्र हों,  पद्मासन में बैठेंदोनों हाथ ध्यान मुद्रा मेंरीढ़ सीधीगर्दन सीधी | 

अभ्यास -  मन केवल "स्वयं" पर केंद्रित | ऐसा मानो इस दुनिया में आप अकेले हो | किसी दूसरे मनुष्य की कल्पना न करें |
        आँखे बंद करेंशरीर के तीन भागों स्थूल, सूक्ष्म और कारण की धारणा करें |  इसके बाद - 
१- स्थूल शरीर पर ध्यान करे | पैर की प्रत्येक अंगुली से प्रारम्भ करते हुए सिर तक सभी अंगो-भागों के आंतरिक और बाहरी संरचना को एक-एक मिनट तक अंतर्दृष्टि से देखें | यह अनुसन्धान करे कि वह भाग-अंग किस शक्ति से कार्य कर रहा है और क्या कार्य कर रहा है | यदि उस भाग-अंग कार्य करना बंद  हो जाये तो उसके परिणामों को भी महसूस करे | 
इसके बाद -----
२- सूक्ष्म शरीर पर ध्यान करे | सूक्ष्म शरीर "मन" है | मन क्या है, कहाँ है - यह अनुसन्धान करें |  मन में विचार-वृत्तियाँ उठ रही हैं, प्रत्येक वृति को देखे, जैसे विद्या-२ अभ्यास में किया था | मन को प्रत्येक इन्द्रिय में स्थित करें और यह देखें की उस इन्द्रिय के संयोग से क्या भाव उत्पन्न हो रहा है, उस संयोग से संसार की ओर जिस शक्ति से मन आकृष्ट हो रहा है, उस शक्ति का अनुसन्धान करें, उस पर नियंत्रण की चेष्टा करें | 
इसके बाद ----
३- कारण शरीर पर ध्यान करें | हम जो भी कार्य करतें उसके औचित्य पर दृष्टी रखनेवाला और कार्य करने या ना करने का संकेत देनेवाला मन में जो दृष्टा है, उसका अनुसन्धान करें | जैसे हम कोई गलत काम करतें है तो मन में भय उत्पन्न करके वह काम न करने का संकेत करता है, अच्छा काम करते हैं तो मन में प्रसन्नता उत्पन्न करके वह काम करने का संकेत करता है | यह दृष्टा ही ईश्वर के अंश रूप में हमारे शरीर में विद्यमान है | इसको कारण शरीर भी कहतें हैं | इसका अनुसन्धान करें - यह कहाँ स्थित है, इसके संकेतों को मानने या न मानने के प्रभावों को महसूस करें | 

समय -  प्रतिदिन सुबह और शाम को 30-30 मिनट निर्धारित समय पर अभ्यास करें | 

परिणाम -    परिणामों को ध्यान में रखकर इस अभ्यास ना करें इस अभ्यास के परिणाम गुप्त रखे   अभ्यास  अनुभव  हमें अवश्य सूचित करें 

आलोक सोनी 

Monday, 25 February 2019

विद्या-२ : विचारों का स्वरुप


विचारों का स्वरुप

 
विद्या-२


       हमने विद्या-१  विचार दर्शन में यह विचार किया कि हमारे मस्तिष्क में विचारों का अनवरत प्रवाह हो रहा है | एक भी विचार वृत्ति पर हमारा नियंत्रण नहीं है | मस्तिष्क में नकारात्मक विचारों की उत्पत्ति अधिक होती है | विद्या-१ में हमने विचारों की उत्पत्ति कहाँ से हो रही है, उत्पत्ति का कारण के बारे में अभ्यास किया है | आज विद्या-२ में हम अगले चरण का अभ्यास करेंगे | इस चरण में हम विचारों के स्वरुप का अभ्यास करेंगे आतंरिक शक्तियों को जानने के लिए विद्याओं का अभ्यास प्रारम्भ करते  है
 - विचारों के स्वरुप की विद्या का अभ्यास -

शर्त -   स्वयं की आतंरिक शक्तियों को जानने की जिज्ञासा हो नियमित अभ्यास करने की इच्छा हो एकांत स्थानआरामदायक वस्त्र , पद्मासन में बैठेंदोनों हाथ ध्यान मुद्रा मेंरीढ़ सीधीगर्दन सीधी | 

अभ्यास -  मन केवल "स्वयं" पर केंद्रित | ऐसा मानो इस दुनिया में आप अकेले हो | किसी दूसरे मनुष्य की कल्पना न करें |
        आँखे बंद करें, विचारो को देखें -  विचार का स्वरुप क्या हे | ये स्वरुप असतकर्म में प्रवृति होना, अच्छे कर्मों से दूर रहना, प्रमाद होना, मोह, अपवित्रता, अनाचार के कर्म, असत्य कर्म, बुरी इच्छा से कर्म, द्वेष आदि स्वरुप हो सकते है |  बस इसी तरह एक एक विचार के पीछे गुप्तचर की तरह पीछे लगे रहे और यह पता करे कि विचार का स्वरुप क्या है  | यह अभ्यास  क्या और क्यों कर रहे हैं इसका विचार नहीं करे  | 

समय -  प्रतिदिन सुबह और शाम को 30-30 मिनट निर्धारित समय पर अभ्यास करें | 

परिणाम -    परिणामों को ध्यान में रखकर इस अभ्यास ना करें | इस अभ्यास के परिणाम गुप्त रखे   अभ्यास  अनुभव  हमें अवश्य सूचित करें

आलोक सोनी 

Saturday, 23 February 2019

विद्या - 1 : विचारों का दर्शन


विचारों का दर्शन

विद्या1

एक क्षण को स्थिर होकर मेरी बात पर विचार करियेगा | यह बात बहुत ही सामान्य-सी है, किन्तु बहुत गहराई  की है,| "आप निरंतर विचार करते हैं" सही है न ? हमारे जन्म से निरंतर विचार चल रहे है, भविष्य में भी चलते रहेंगे, ठीक कहा ना ? विचार चल रहे है निरंतर निरंतर | कैसे विचार ? सकारात्मक या नकारात्मक विचार ? बिना किसी नियंत्रण के आ रहे है ? क्यों ? आप इतने बेबस हैं की एक विचार या विचारों पर नियंत्रण भी नहीं रख पा रहे है | ये क्या हो रहा है आपके मन में ? क्या विचारों का युद्ध क्षेत्र बना हुआ है आपका मन ? आप देख रहें है या केवल महसूस ही कर रहें है विचारों के संघर्ष को ? ओह  "धृतराष्ट्र" (अंधे दृष्टा) की भूमिका में है | आपका कोई नियंत्रण नहीं है विचारों पर, पर लगता है नकारात्मक विचारों को आप अपना मानते है | सही कहा ना ? हाँ, सही है क्योंकि जल्दी इकठ्ठा हो जाते है, बड़ी मात्रा में इकट्ठा होते है, आपके पक्ष में रहते है   अंधे दृष्टा और नकारात्मक विचारों का पिता-पुत्र जैसा साथ है | सकारात्मक विचार कम मात्रा में आते है, धीरे धीरे आते है, आपकी बात सरलता से नहीं मानते | कभी कभी वो अँधा-द्रष्टा बुद्धि  से पूछता है की ये सब विचार मन में इकठ्ठा होकर क्या कर रहे हैं | इन विचारों की अभिलाषा क्या है ?  बस यही प्रश्न आपकी प्रगति का राज है | तो आइये - 

            आतंरिक शक्तियों को जानने के लिए विद्याओं का अभ्यास प्रारम्भ करते है | 

- विचारों के दर्शन की विद्या का अभ्यास - 

शर्त -   स्वयं की आतंरिक शक्तियों को जानने की जिज्ञासा हो |  नियमित अभ्यास करने की इच्छा हो | एकांत स्थान, आरामदायक वस्त्र , पद्मासन में बैठें, दोनों हाथ ध्यान मुद्रा में, रीढ़ सीधी, गर्दन सीधी

अभ्यास -  मन केवल "स्वयं" पर केंद्रित | ऐसा मानो इस दुनिया में आप केले हो | किसी दूसरे मनुष्य की कल्पना न करें |
        आँखे बंद करें, विचारो को देखें -  विचार कहाँ से उत्पन्न हो रहा है, विचार उत्पन्न होने का कारण क्या है, क्या आपका कर्म या अभ्यास या ऐसा वातावरण विचार उत्पन्न होने का कारण है | बस इसी तरह एक एक विचार के पीछे गुप्तचर की तरह पीछे लगे रहे | यह अभ्यास  क्या और क्यों कर रहे हैं इसका विचार नहीं करे | 

समय -  प्रतिदिन सुबह और शाम को 30-30 मिनट निर्धारित समय पर अभ्यास करें

परिणाम -    परिणामों को ध्यान में रखकर इस अभ्यास ना करें | इस अभ्यास के परिणाम गुप्त रखे   अभ्यास  अनुभव  हमें अवश्य सूचित करें | 


(आलोक सोनी)